हरियाणा के मशहूर लेखक नवीन विशु की आज के हालात पर कविता ‘कोई आज़ाद होके भी कैद’

कोई आज़ाद होके भी कैद है।
कोई कैद होके भी आजाद है।
सच कहूं दोस्तो प्रकृति पूर्ण रूप से अब आबाद है।।

ये हवा अपनी मुस्कान से मानो किसी का धन्यवाद कर रही है।
खेतो की हरियाली खुश होने के दावे की हाँ भर रही है।।

वो सूने खेत सुने बाज़ार सुनी गलिया बोल रही है कुछ यूं।
तुम हो तो मैं हूं, तुम हो तो मैं हुँ।।

पर थोड़ा बहुत आराम हमे भी करने दो लाडलो आप लोगो का एहसान होगा।
कुछ तो जीत गई हैं अपनी संस्कृति कुछ दिन तो रुको संसार मे हर जगह भारतीय संस्कृति का बखान होगा।।

जो कुछ भी हो रहा ज़रूर आगे उसमे कुछ खास है।
एक बूढ़ी माँ हाथ जोड़ के लॉकडाउन का धन्यवाद करती हुई कह रही थी आज तेरी वजह से मेरा बेटा मेरे पास है।।

प्रकृति बांट रही है अमृत सब मिलकर के पी लो यारो।
बहुत हो गई भागदौड़ कुछ दिन परिवार के साथ अच्छी तरह जी लो यारो।।

हुई गंगा साफ है जमना साफ, थोड़ा मन भी साफ कर लो।
कभी डर की भी इज्जत किया करो कसम से अब टाइम ह थोड़ा सा डर लो।।

ये सुनी गलिया, सुने खेत, सुना बाज़ार सुनी सड़के फिर तुम्हें बुलाएंगे।
मेरा वादा है दोस्तो भारत माता की कसम बहुत जल्दी हम जीत जाएंगे।।

कुछ दिनों रुको घर पे यारो बाहर जाने का क्यो लेना पंगा।
थोड़े दिन रुको दिखाता हुँ हमारे संसार के गुरु भारत का सबसे ऊंचा लहराएगा तिरंगा।।

हिंदुस्तान में जन्म लिया है यार तू कितना लक्की है।
हौसला रख मेरे यारा जीत हमारी पक्की है।।

मेरा गाम पपोसा आज डटकर खड़ा है।
सब मिल कर मुकाबला करंगे नवीन विशू क्यो की हिंदुस्तान का दिल बहुत बड़ा है ।।

हिंदुस्तान का दिल बहुत बड़ा है, खत्म हो चुका मानो सब विवाद है ।
कोई आज़ाद होके भी कैद ह कोई कैद होके भी आज़ाद है ।।

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